वाल्मिकी रामायण की खाद्यसंस्कृति: महाकाव्य के समय की खाद्य विरासत की खोज/Mahākāvya ke samay kī khādya virāsat kī khoj - Softcover

अनिल धर्माधिकारी

 
9798902073550: वाल्मिकी रामायण की खाद्यसंस्कृति: महाकाव्य के समय की खाद्य विरासत की खोज/Mahākāvya ke samay kī khādya virāsat kī khoj

Synopsis

यह पुस्तक मूल वाल्मीकि रामायण में उल्लिखित खाद्य-पदार्थों और कृषि-प्रथाओं के मूल संदर्भों को प्रस्तुत करती है। अब तक अधिकतर चर्चा एक ही विषय के आस पास घूमती रही है—क्या श्रीराम मांसाहार करते थे? इस विषय पर पक्ष और विपक्ष में अनेक कथाएँ और तर्क प्रस्तुत किए जाते रहे हैं। परंतु यह पुस्तक रामायण में वर्णित खाद्य-सामग्रियों को समग्र दृष्टि से समझने का प्रयास करती है। यह पुस्तक रामायणकालीन भोजन परंपराओं का विस्तार से परिचय कराती है—दैनिक आहार से लेकर अनुष्ठानों में प्रयुक्त विशिष्ट पदार्थों तक—और प्राचीन भारत की सांस्कृतिक व पाक-परंपराओं की एक रोचक झलक प्रस्तुत करती है, जहाँ दिव्य भोज, पवित्र संस्कार और वैभवपूर्ण दावतें देवताओं, राजाओं, ऋषियों और योद्धाओं के जीवन को आकार देती थीं। इस पुस्तक में केवल मनुष्यों की ही नहीं, बल्कि राक्षसों और वानरों की खाद्य-आदतों का भी उल्लेख है, जो इस महाकाव्य के विविध पात्रों को समझने का एक अनूठा दृष्टिकोण प्रदान करता है। राम के जन्म का कारण बने दिव्य पायसम से लेकर ऋषियों के भव्य उपहार-भोज तक, यह पुस्तक उस युग के भारत और लंका के स्वादों की सैर कराती है। रावण के निजी मदिरा-संग्रह की भव्यता, कुम्भकर्ण की असाधारण भूख, तथा सोम और पवित्र पेयों का आध्यात्मिक महत्व—सबका विस्तृत वर्णन इसमें मिलता है। फलों और सब्जियों से लेकर मांस, मछली, समुद्री आहार, मदिराओं और औषधीय पौधों तक—वाल्मीकि रामायण में उल्लिखित प्रत्येक खाद्य-संदर्भ को यह पुस्तक सुसंगत रूप से प्रस्तुत करती है।

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