ज़िन्दगी बड़ी सहज होती है। हाय-हाय, भाग-दौड़ से वह सहजता नहीं रह पाती। कभी-कभी अति महत्वाकांक्षाएँ ऐसी अँधेरी गुफा में ला छोड़ती हैं, कि हाथ मलना ही शेष रह जाता है, ज़िन्दगी एक छलावा बनकर रह जाती है। विट्ठला भी बड़ा महत्त्वाकांक्षी था। ग़रीब परिवार की मर्यादा भूलकर, ऐशो-आराम का जीवन जीना चाहता था, लेकिन क्या हुआ? ऊँचे परिवार की एक विधवा से क्या दिल लगा बैठा कि अकाल मृत्यु का ग्रास बन गया। अब उसकी अतृप्त आत्मा भटकती रहती है—पश्चात्ताप करने के लिए। लेकिन उसे ऐसा कोई उपयुक्त पात्र नहीं मिलता जिसकी मदद करके वह भूत योनि में भी कुछ पुण्य अर्जित कर सके। सुप्रसिद्ध नाटककार विजय तेन्दुलकर की ऐसी रोचक नाट्य-कृति जिसमें सामाजिक विसंगतियों, धर्माडम्बरों और चली आ रही पुरानी कुरीतियों पर सटीक रूपक के माध्यम से तीखा प्रहार किया गया है। तेन्दुलकर के अन्य नाटकों की तरह रंगशिल्प और भाषायी रोचकता के लिहाज़ से एक सक्षम नाट्य-कृति।
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