बहुराष्ट्रीय निगमों की बढ़ती मौजूदगी और कारपोरेट दुनिया में कार्य-संस्कृति पर लगातार एक नैतिक मूल्य के रुप में जोर दिए जाने के बावजूद भारतीय मध्यवर्ग की पहली पसन्द आज भी सरकारी नौकरी ही है, तो उसका सम्बन्ध, उस आनन्द से ही है जो गैर-जिम्मेदारी, काहिली, अकुंठ स्वार्थ और भ्रष्ठाचार से मिलता है; और हमारे स्वाधीन पचास सालों में सरकारी नौकरी इन सब ‘गुणों’ का पर्याय बनकर उभरी है। इन्हीं के चलते तबादला-उद्योग वजूद में आया जो आज दफ्तरों से लेकर राजनेताओं के बंगलों तक, शायद बाकी कई उद्योगों से ज्यादा, फल-फूल रहा है।
इस उद्योग के जिन बारीक डिटेल्स को हम बिना इसके भीतर उतरे, बिना इसका हिस्सेदार बने, नहीं जान सकते, उन्हीं को उपन्यास इतने तीखे और मारक व्यंग्य के सामने रखता है कि हमें उस हताशा को लेकर नए सिरे से चिन्ता होने लगती है जो भारतीय नौकरशाही ने पिछले पचास सालों में आम जनता को दी है। इस उपन्यास का वाचक व्यंग्य के उस ठंडे कोने में जा पहुँचा है जहाँ ‘कोई उम्मीदबर नहीं आती’। उपन्यास पढ़कर हम सचमुच यह सोचने पर बाध्य हो जाते हैं कि अगर यह हताशा वास्तव में हमारे इतने भीतर तक उतर चुकी है तो फिर रास्ता है किधर !
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