धम्मपद ' ग्रंथ को पाठकों के समक्ष लाने का मेरा अभिप्राय इस ग्रंथ की शिक्षा से पाठकों को लाभान्वित कराना है- यथागार सुच्छन्न॑, बुद्धि न समतिविज्ञति। एवं सुभावितं चित्त, रागो न समतिविज्ञति। | जैसे ठीक से छाए घर में वर्षा जल नहीं घुसता, ठीक वैसे ही ध्यान भावना से चित्त में विकार नहीं घुसता इसी प्रकार देश को सुव्यवस्था से नैतिकता और राष्ट्रीयता का उत्थान होता है जैसे गाथा में ध्यान भावना का उदाहरण देकर कहा है वैसे ही सुव्यवस्थित देश में शत्रु रूपी विकार नहीं घुस सकता। “जहाँ है चित्त की शुद्धि वहीं है बुद्धि '- इस ग्रंथ का यही सार है।
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