भारतवर्ष के संदर्भ में आरक्षण एक गूण विषय है जिसके अंतर्गत अनेक प्रकार के आरक्षण आते हैं, जैसे राजनेटिक आरक्षण, सामाजिक आरक्षण, आर्थिक आरक्षण, न्यायायिक आरक्षण, रक्षा सेवाओं में आरक्षण, व्यावसायिक आरक्षण तथा सरकारी व प्राइवेट नौकरियों में आरक्षण आदि। भारतवर्ष में सदियों से आरक्षण का वोलवाला रहा है, जिसमें जातिगत व वर्णगत आरक्ष्ण को ही अधिक महत्व दिया गया है। सनातन हिन्दू काल से कभी भी आर्थिक आधार आरक्षण का विषय नहीं रहा है बल्कि सामाजिक सम्मान ही आरक्षण का विषय रहा है। जातिगत व वर्णगत आरक्षण के कारण भारत को वर्षों गुलामी की जंजीरों से बांध कर रखा गया। जिस समय भारत को सोने की चिड़िया का काल कहा जाता है उस समय भी आरक्षण के आधार पर बोद्धिक संपदा पर अधिकार ब्रहमण वर्ग को ही था किन्तु ब्रहमण वर्ग भी विभिन्न जतियों और उपजातियों में बटा हुआ था, इस कारण किसी बात पर एक मत होना असंभव था क्योंकि सभी गुटों के अपने अपने निजी स्वार्थ थे। मेरा मानना है कि सभी प्रकार का आरक्षण समाप्त कर दिया जाय और नए सिरे से सभी जातियों को उनकी आबादी के प्रतिशत के हिसाब से नौकरियो मे तथा राजनैतिक भागीदारी में आरक्षण की सीमा निश्चित कर दी जाए फिर उसी अनुपात में चाहे सामाजिक आधार् हो, आर्थिक आधार अथवा किसी भी आधार पर उसी जाति के हिस्से में से बटबारा कर दिया जाए , इससे सभी झगङे स्वतः समाप्त हो जायेंगे I इस पुस्तक में सामाजिक न्याय का प्रथम सोपान “आरक्षण” के मूल पहलुओं पर विचार विमर्श कर उन पर प्रकाश डाला गया है। आशा है पाठकगण उससे सहमत होंगे और अपना समर्थन देंगे। किसी भी सुझाव का स्वागत किया जाएगा। पाठकगण अपने सुझावों से मुझे अवगत करने की कृपा करें जिससे आगामी प्रकाशनौ में सुधार कर प्रस्तुत किया जा सके।
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